रात का सन्नाटा

रात का सन्नाटा कुछ तो कहना चाहता है..

” कि निमिष “

तू तन्हा.. यह दिल तन्हा..
फिर क्यों झूठे ख्वाबों में मन बहलाता है ..

जीत ली जंग कहीं किसी ने ..
मुझे क्या..
तू आज भी हार कर मां के आंचल में सोना चाहता है ..

सच में यह रात का सन्नाटा आज मुझसे बहुत कुछ कहना चाहता है..
कि निमिष शायद ..
तू इन जिम्मेदारियों से कहीं दूर भाग जाना चाहता है..
बचपन के दिनों में लौट जाना चाहता है ..
पापा की डांट में छुपे उस बेशुमार प्यार को फिर से पाना चाहता है..
उन्हें फिर महसूस कराना चाहता है ..
कि तू अब बड़ा हो चुका है,,
बहुत बड़ा हो चुका है ..
पर आज भी तू उनकी छोटी उंगली पकड़कर..
फिर से उन्हीं रास्तों को बार-बार देखना चाहता है ..

आंखों में आंसू कभी होते असली तो कभी निकले थे..
तो कभी मनसा चांद को छूने की तो कभी सूरज को मुट्ठी में रखने को कहते थे..

ना जाने क्यों बार-बार यह दिल इन्हीं बातों को दिन में 10 दफा दोहराता है….
सच में यह रात का सन्नाटा कुछ तो कहना चाहता है..
जिम्मेदारियों की बेड़ियां तोड़ बच्चा वन बस प्यार समेटना चाहता है..

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