तेरा जिस्म

बड़ी खूबसूरत सूरत थी उसकी

ताउम्र चर्चे में रहा
किसी ने अपनी दहलीज का दरवाजा खोला

तो किसी ने अपने दिल का
पर जब खुदा का कहर बरसा
तब कोई भी उसका अपना ना रहा
बेबाक पढ़ा था जमीन पर
चार कंधे थे उसे अपने अंतिम सफर पर ले जाने को
किसी ने भी उसे अपने घर में पनाह ना दी
जिस्म के सारे वस्त्र भी उतार दिए गए
तब उसकी रूह यह देख कर काप उठी
और बोली
मैं तो तेरा ही था पर क्यों ना तूने मुझे एक पल भी अपने घर में पनाह न दी

निमिष परिहार

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