“Half Boyfriend”

” पहला भाग

मैं निमिष परिहार, अक्सर अपने काम के सिलसिले मेँ विदेश जाता रहता हूँ.. इस बार भी मुझे अमेरिका के शिकागो शहर मेँ जाना था,,

अमेरिका अपनी ऊंची -ऊंची ईमारतों और अपने आधुनिक विज्ञान के कारण पूरे विश्व में विख्यात है. वहाँ मुझे एक भारतीय विकुल के साथ रूकना था.. विकुल वहाँ एक telecom company मे engineer थे.

और उनकी पत्नी भी भारत से ही थी. वो वहाँ पर बहुत खुश थे क्योंकि उनके पास सब कुछ था. उनकी एक बच्ची भी थी जिसका नाम उन्होंऩे अभी रखा नहीँ था .वो मेरी बहुत अच्छे मित्र बन चुके थे तब मैंने एक दिन उनकी सफलता की कहानी जानने की इच्छा प्रकट की ..तब वो मुस्कुराए और बोले-” बड़ी लंबी कहानी है भाई ”

मैे उनसे बोला ठीक है ना मेरे पास भी बहुत वक्त है आपकी लंबी कहानी सुनने के लिए ,तब उन्होंने अपनी कहानी आरंभ की – ”

मेँ एक छोटे से गांव मेँ जिसका नाम “उटिया”  है  रहता था. मेरे पिताजी रेल्वे में कायृरत थे. पर फिर भी वह इतने समथृ नहीं थे कि वो मुझे ओर मेरे बडे, भाई बहन को अच्छी तालीम दे सकें..

लेकिन उन थोड़े से पैसों मेँ भी उन्होंने हमे आगे बढ़ाया. मे कक्षा सातवी तक उटिया के एक सरकारी स्कूल मेँ पढ़ा!  फिर पापा को एहसास हुआ कि इस छोटे से गांव मेँ मेरे बच्चो का भविष्य नहीँ हे! तो वो हमेँ उटिया के पास मेँ एक छोटे से शहर होशंगाबाद मे ले आए!  होशंगाबाद माँ नमृदा की पावन नगरी, जहाँ बहुत बड़ी बड़ी ईमारतें थी, बहुत ही मनमोहक माँ नमृदा के मंदिर, और घाट थे

हमने वहाँ एक किराए का मकान लिया, जहाँ पर मैं, मेरा बडा भाई रजित, ओर बडी बहन सीमा रहने लगे….

पापा मम्मी के साथ गाँव में रहने लगे क्योंकि उन्हें रोजाना दफ्तर जाना होता था…

मेने सेठ गुरु प्रसाद मेँ अपना दाखिला लिया, वहाँ सभी बडे घर के बच्चे पढ़ने आते थे कोई कार मेँ अपने, माँ-पापा के साथ आता था तो कोई महंगी साइकिलों से, मेरा घर स्कूल से दूर था.! पर मेरे पास साइकिल नहीं थी वहाँ तक आने के लिए तो मै रोज आधे घंटे पहले अपने घर से निकल जाता था.! और पैदल अपने स्कूल को टाइम पर पहुँच जाता था…

कुछ दिन यूँ ही चलता रहा.! पर मेरे मन मेँ ईष्र्या अपना घर कर गई थी,. मेने अपने पापा से कहा – “पापा मुझे भी साइकिल चाहिए”

वो बोले रूक बेटा एक महीने अभी, मैंने तेरी बड़ी बहन की कॉलेज की फीस दे दी है.!  पर मेँ नहीँ माना,, जिद पर अड़ा रहा! फिर पापा मेरे लिए एक सेकंड हैंड साइकिल ले आए,, मैँ उसे पा कर बहुत खुश था.!

घर से बाहर रहने की हमे आदत ना थी माँ की याद सताने लगी..!  घर की याद सताने लगी.. वही वक्त था जब मेरा बडा भाई मेरा अच्छा  दोस्त और मेरी बहन मेरी माँ बन गई.!  हम तीनो अपनी उदासी को मिटाने के लिए रोजाना घाट पर जाने लगे..!

एक समय ऐसा आया जब हम माँ – पापा के बिना नहीँ रह पाए,, और हमने उनको हमारे पास रहने की सलाह दी…!

तो कुछ समय बाद हम सब उस छोटे से किराए के मकान मे रहने लगे..! फिर क्या था वो छोटा सा लकडी का घर ही हमारे लिए स्वर्ग बन गया था…!

हम शहर के रहन – सहन और वहां के तौर – तरीकोँ से बाकिव न थे… मेने भी अपने आप को शहर के माहौल मेँ ढालने की कोशिश की..!

पर मेँ नाकाम रहा, सब मेरा मजाक उडाते ओर कहते कि – “कितना तेल लगाता हे, केसे कपडे पहनता हे,” ओर मुझ पर हँसते..!

तब मैंने समाज के दिखावे से अपने आप को दूर कर लिया। मेने अपना ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित कर दिया। पर वहाँ पर भी  शुरूआत मे, मैं खरा नहीँ उतरा, क्योंकि रघुवीर सर रोज कुछ याद करने को कहते और मेँ प्रतिदिन की तरह पाठ का रट्टा मार लेता पर स्कूल आते आते मेँ सब कुछ भूल जाता…!

पर अब मैंने पहले से भी ज्यादा मेहनत करने की ठानी,, मेँ रात मेँ 2 बजे तक पढ़ता, फिर अपनी माँ के पास जा कर सो जाता। वहां पर मेरे अच्छे दोस्त बन गए सुमित, अंकित, मनीष हमेशा मेरा साथ देते…।

इम्तिहान का वक्त नजदीक था, फिर क्या था डर तोे जैसे मेरे मन मेँ घर कर गया था। दीदी को मुझे पढाने के लिए सताने लगा। उन्होंने मुझे सपोर्ट किया। और मै कक्षा आठ फस्ट division से पास हो गया.। यहाँ तक कि मेने सभी विषयों मेँ विशिष्ट योग्यता भी प्राप्त की..।

अब एक नई समस्या मेरे सामने थी। कक्षा 9 मेँ  पढने के लिए मेरे पास पर्याप्त फीस नहीँ थी, इसलिए मेने बहाना बनाया ओर पापा को कहा कि – “पापा ये लोग पढ़ाते अच्छा हैं पर बहुत मारते हैं” । उस समय मेने अपनी बात को सच साबित करने के लिए अपने हाथ पर एक खरोंच मार ली, ओर कहाँ कि -” देखिए पापा इस बात का प्रमाण।

पापा मेरे झूठ को सच मान गए,, ओर मेरे लिए एक अच्छा स्कूल ढूंढने लगे। तभी मुझे उत्कृष्ट विद्यालय के विषय मेँ पता चला कि, उत्कृष्ट विद्यालय कम फीस में अच्छी पढाई कराता हे। यहाँ तक की लाइब्रेरी, फुटबॉल, बास्केटबॉल, कल्चरल एक्टिविटी की सुविधा भी इस स्कूल में है।

मैंने उस स्कूल का इंट्रेन्श एग्जाम दिया ओर मेँ पास हो गया….! कक्षा नौ मेँ मेने पढ़ना शुरु किया। वहां सब नये लोग थे मेरे लिए,, पर समय सब सिखा गया कि मुझे अपनी जिंदगी कैसे जीना हे। कुछ अच्छे दोस्त बने प्रदीप, संजय, आशीष ये सभी मेरे घनिष्ठ मित्र बन गए।

मैं इन्हीं के साथ पढ़ता, मस्ती करता, घूमने जाता। ये सभी कोचिंग इंस्टीट्यूट जाते पर मेँ पैसों के अभाव के कारण कभी कोचिंग इंस्टिट्यूट नहीँ जा पाया,,, पर मेँ घर मेहनत करता और हमेशा अच्छे माक्सृ लाता।

ओर मेरी मेहनत रंग लाई, कक्षा 9 मेँ पूरी क्लास में फस्ट आया। पापा ये सुनकर बहुत खुश थे। मुझे एक नई साइकिल तोहफे में दी…! मै बहुत खुश था

इसी इंस्पृेशन के साथ मेँने कक्षा 10 मेँ कड़ी मेहनत की… पर प्रदीप क्लास मेँ प्रथम आया और में द्वितीय स्थान पर था,,। पर मुझे इस बात का दुख नहीं था क्योंकि वो मेरा घनिष्ठ मित्र था..।

कक्षा 10 के बाद मेरी जिंदगी एक नया मोड़ लेने वाली थी,, कक्षा 11 मेँ हमारी क्लास को का्मन कर दिया गया,, जहाँ लड़के – लड़की एक ही बेंच पर बैठते और पढ़ाई करते तब मैं बहुत शर्मीला था,, और मुझे लडकियो से डर भी लगता था,,। मैँ सोचता था कि अगर मैँ उनसे बात करुंगा तो वो मुझे धुतकार के भगा देंगी।

क्योंकि मैँ दिखने मेँ बाकी लडको की तरह मस्कुलर और सुंदर नहीँ था। पर पर हाँ मेरे चेहरे पर एक सादगी ओर मासूमियत थी।

तभी कच्चा ११ मेँ एक लडकी ने दाखिला लिया,.। दिखने मेँ बहुत सुंदर थी, उसकी बडी – बडी आंखेँ, उसके लंबे – लंबे बाल, ओर उसकी वो सादगी,, उस समय मेरे दिल मेँ कुछ हरकत हुई,, में यह नहीँ कह रहा कि “आई फॉल इन लव” लेकिन कुछ कनेक्शन तो था हमारे बीच मेँ.।

तब मैने उससे बात करने की बहुत कोशिश की, पर मेरा डर मुझ पर हमेशा हावी रहा। और मे उस से कभी बात नहीँ कर पाया। तब पता चला कि वो मेरे ही गाँव उटिया से आयी है। मै अचंभित था, पर मेँ खुश भी था… कि वो वहाँ से है।  मेने उसके बारे मेँ अपनी एक अच्छी फ्रेंड प्रिया से पता किया क्योंकि प्रिया उसकी बहुत अच्छी दोस्त थी ओर वह भी उटिया से थी।

तब प्रिया मुस्कुराई और बोली – “अच्छा आज सूरज पश्चिम से निकला हे क्या जो विकुल भैया किसी लडकी के बारे मेँ जानना चाहते हैं”

मैँ उसकी बात सुन कर शरमा गया ओर मुस्कुराते हुए बोला – “बस यूँ ही, बताना हे तो बता , नहीँ तो रहने दे , मेरी टांग मत खींच”

फिर उसने मुझे उसके बारे मेँ सब बताया, कि वो कोन हे। उसकी माँ पापा कहाँ रहते हैं। और क्या करते हैं। पर उसने मुझे उसका नाम नहीँ बताया था।

तब मैंने धीरे से उससे कहा-” पूरी कहानी सुना दी अब हीरोइन का नाम भी बता दे”

फिर मेरी तरफ देखकर मुस्कुराने लगी ओर बोली-” अो..! वो हीरोइन, और तू कौन उसका हीरो”

फिर बोली – “चल ठीक हे तुझे परेशान नहीँ करती उसका नाम रिया पटेल है,” और वो वैसी लडकी नहीँ हे..। ”

मेने उसे रोका और कहा -” कहना क्या चाहती हे, मुझे बस दोस्ती करना हे ओर मे भी वैसा लड़का नहीँ हूँ। ”

उस दिन में घर गया, मम्मी से बातों – बातों मेँ पूछा कि एक लडकी हे अपने ही गाँव की जिसका नाम रिया पटेल है,, ओर पापा का नाम मयंक पटेल है। तब मम्मी ने बताया कि वो मेरी दूर की मासी लगती हे।

मेँ यह सुन कर अचंभित था, मेरा दिल बैठ गया। मेँ बार बार माँ से पूछने लगा कि आपने जो कहा वो सब सच है।  माँ मुझसे बार बार  कहती रही हाँ एक दम सच है।

पर फिर मुझसे बाद मेँ बोली कि बहुत दूर का रिश्ता हे। तो मैंने अपनी संतुष्टि के लिए माँ से कहा कि-” माँ वो बहुत अच्छी लडकी हे। अगर कल भइया की शादी उससे कराते हैं तो हो सकती हे? “… माँ बोली -” हाँ हो सकती हे “।

तो मेँ यह सुनकर खुश था क्योंकि भाई के सहारे, मेँ अपने दिल कि शंका दूर करना चाहता था।

अब मै रोज उसे छुप छुप कर देखता, उससे बात करने की कोशिश करता, इसी बीच प्रदीप उसका बहुत अच्छा दोस्त बन गया था। प्रदीप से बोलने की इच्छा हुई कि उससे बात करेँ,,, पर मेँ हमेशा डरता रहा।

कक्षा 12 का अंत नजदीक था और मेरा मन ये सोच कर रो रहा था,,,, कि मैँ अब उसे देख भी नहीँ पाऊंगा।

यह बात मैंने अपने घनिष्ठ मित्र सुनील और आकाश को भी बताई पर समय निकल गया,,, ओर वो मुझसे दूर चली गई।

मेरा मन भर गया, दिल रो दिया, पर हिम्मत नहीँ हारी,, मे यह सोच कर संतुष्ट हो गया कि भगवान हमे साथ नहीँ देखना चाहते थे…

तब मन मेँ बस इतना था कि मुझे अपना भविष्य संवारना हे। इसलिए मैंने पी. ई. टी. का एंट्रेंस एग्जाम दिया,, इंजीनियरिंग कॉलेज मेँ दाखिला लेने के लिए। और मैने 76.7 नंबर के साथ इस एग्जाम को पास किया। तब मुझे बंसल कॉलेज मेँ दाखिला मिला, जो कोलार रोड भोपाल में था।

”  दूसरा भाग”

अब नयी समस्या मेरे सामने थी,, हिंदी से अंग्रेजी की समस्या,, अब मेरे सारे विषय अंग्रेजी मेँ थे। मुझे शुरूआत मेँ बहुत कष्ट हुआ,, पर, रिया का गम भुलाने के लिए मे बहुत मेहनत करने लगा में प्रतिदिन कॉलेज जाता और रात – रात भर घर पर पढ़ता..।

शुरुआत मेँ मेरे पास भोपाल मेँ रहने लायक पैसे नहीँ थे। इसलिए मैं होशंगाबाद से भोपाल तक प्रतिदिन अप – डाउन करने लगा, सुबह पांच  बजे उठता, छत्तीसगढ ट्रेन पकड़ता और हबीबगंज पहुँचकर 09:30 पर कॉलेज की बस पकड़ता..!

कुछ दिन बीते,, मेँ अब रिया को अपने दिल से पूरी तरह से भुला चुका था..!

रोजाना की तरह ही में एक दिन हबीबगंज पर कॉलेज की बस का इंतजार कर रहा था, तभी कुछ कॉलेज के सीनियर आए और मुझे अपने कपड़े उतारने के लिए कहने लगे। मैंने मना कर दिया, तो उन्होंने मुझे पीटा ओर वहाँ से भाग खड़े हुए..!

मैं अकेला रो रहा था। कोई नहीँ था वहाँ मुझे चुप कराने के लिए तभी मम्मी की याद सतायी,, ओर मेँ वापस घर आ गया.।

तब मेने अपने भाई को उस घटना से अवगत कराया,, तब भाई ने अगले दिन मेरे साथ आने की इच्छा व्यक्त की… अगले दिन वही सीनियर फिर आए,, और मुझे छेड़ने लगे तब पीछे से मेरा भाई आया, और उन्हें बहुत पीटा फिर उन्होंने मुझसे माफी मांगी तब मुझे समझ आया कि बुरे के साथ बुरा करना गलत नहीँ होता..

अब मुझे कोई डर नहीँ था। बस इंतजार था, तो एक बेहतर भविष्य का.। दिन बीते ओर पापा का प्रमोशन हो गया तो उन्होंने मुझे भोपाल मेँ किराए का एक मकान दिला दिया। अब मैं वही रहकर पढने लगा।..

वहीं पर मेरे कुछ अच्छे दोस्त बने, दीपक, आकाश, आदित्य, नारायण, अनुजय यह सभी मेरे घनिष्ठ मित्र बने। मैं उनके साथ हर हफ्ते  रात्रि भृमण पर जाता, और बहुत मस्ती करता..

इसी बीच एक स्कूल का मित्र मेरे साथ रहने आ गया उसका नाम केशव था। अच्छा लड़का था, मुझे आज भी उसकी बिहारी एक्सेंट याद है। मुझसे कहता था-”

तुम खाना खा लिये,, ”

मैँ उसे भी उसी के  एक्सेंट में जबाव देता-” हाँ हम खाना खा लिए “।

समय बीतता गया तभी एक लडकी से मेरी मुलाकात हुई संजना नाम था उसका। हम दोनोँ अच्छे मित्र बन गए थे। हम प्रतिदिन बात करते, और जिंदगी के कुछ अहम पल शेयर करते।

शायद भगवान मेरी कहानी बडी बारीकी से बना रहे थे,,, जो घर में बिहारी दोस्त-केशव, और कॉलेज में भी बिहारी दोस्त – संजना थी। मैं दोनों की बाते सुनकर बहुत हँसता था।

पर समय बहुत खराब होता हे। मुझे कुछ महसूस होने लगा था, संजना के लिए,जिसकी खबर कॉलेज मेँ सब को पता चल गई थी, तब सब उसका मजाक उड़ाने लगे थे। तब मैने उस से दूर जाने की ठानी और वैसे भी हमारा कोई भविष्य नहीँ था।

समय बडा बलवान होता है। वो बहुत प्यारी यादे मेरे मन को दे गया था। पर अब कॉलेज का अंत नजदीक था, और हम सभी ने फेरेवल पार्टी अरेंज की। ओर एक- दूसरे से मिलने के वादे  करने लगे। मेरा कॉलेज कोई फेमस कॉलेज नहीं था।

इसीलिए मेरे कॉलेज मेँ कम ही कंपनियां आती  थी बच्चो को नोकरी पर लेने के लिए। ओर तब मेरी अंग्रेजी भी बहुत कमजोर थी।

तो मेने अपनी अंग्रेजी को सुदृढ़ बनाने के लिए एक अमेरिकन कंपनी पर बेस्ड कॉल सेंटर जॉइन किया। जहाँ हम दवाईयां सेल करते थे। वहाँ मैंने तीन महीने काम किया और तनख्वाह नहीं ली,,, अब मेरी अंग्रेजी मेँ काफी सुधार था।

कॉलेज का अंत नजदीक था ओर सर पर एग्जाम का टेंशन था। पर भगवान की दुआ से मेँ अपना आठवां सेमेस्टर भी फस्ट डिविजन से पास हो गया। और मुझे अपनी डिग्री में विशिष्ट योग्यता भी प्राप्त हुई।

अब सामने था एक नया चैलेंज इस दुनिया मेँ अपनी पहचान बनाने का चैलेंज।  तब मैंने भोपाल मेँ ही एक काल सेंटर जाॅइन किया, जहां मैं सीनियर एक्जीक्यूटिव की पोस्ट पर था। और मैं पंजाब नेशनल बैंक के लिए काम करता था।

पर जो में आपको बताने जा रहा हूँ वो कहानी मेरी जिंदगी मेँ एक नया मोड़ लाने वाली थी।!

मेरे पिताजी पर किसी ने तंत्र मंत्र करके उनकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी। और वह मेरी माँ को मारने लगे। हमें भला बुरा कहने लगे। उन्होंने हमेँ सपोर्ट करना बंद कर दिया। यहां तक कि उन्होंने घर खचृ के लिए माँ को पैसे देना भी बंद कर दिया। और अपनी अय्याशी मेँ खर्च करने लगे। तब माँ बहुत परेशान थी तो उनका साथ देने के लिए मुझे ओर मेरे बडे भाई को नौकरी छोडना पड़ा।… पर अब पानी सर के ऊपर से जाने लगा था।

अब यूँ लगता था जेसे मेरे सपने,,, सपने ही रह जाएंगे!.. पर मैंने हिम्मत नहीँ हारी..। और एक टेलीकॉम कंपनी मेँ तकनीशियन की पोस्ट पर काम करने लगा..। जब किस्मत मेरे लिए अपनी बाहेँ फैलाए खडी थी।..

क्योंकि उसी बीच, एक दिन मेँ अपनी फेसबुक प्रोफाइल चेक कर रहा था तब प्रदीप की प्रोफाइल पिक्चर पर मैंने रिया का कमेंट देखा।..

मेरी सारी यादेँ ताजा हो गई!..! ओर मैंने तुरंत उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी। फिर तीन दिन बाद उसने मेरी फ्रेंड रिक्वेस्ट अक्सेप्ट की…।

तब हम प्रतिदिन फेसबुक पर अपनी बातेँ शेयर करने लगे। उसने मुझसे मिलने की इच्छा व्यक्त की ओर मेँ उससे मिलने उसके घर चला गया…।

उसके घर पर सब का व्यवहार देख कर मन प्रसन्न था, उसकी माँ में मुझे अपनी माँ की छवि दिखाई दी,, ओर उसके पिता भी उसी की तरह हमेशा खुश रहने वाले,,, ओर सत्यवक्ता थे।

इसी बीच  मुझे अपनी कंपनी छोड़नी पड़ी क्योंकि मेरे पास नोकरी के लिए बाहर से ऑफर था… तभी मेँ कर्नाटक की राजधानी बंगलोर मेँ रहने लगा तब मैने सोचा कि यही सही समय है रिया को अपने दिल की बात बताने का। तब मेने उसे मुझसे शादी करने के लिए प्रस्ताव दिया पर उसने मजाक में सब टाल दिया!..!

तब मैं उस से एस ए फ्रेंड बात करता रहा, पर एक समय एेसा आया जब उसने मुझसे कहा की वो भी मुझसे प्यार करने लगी है,,, ओर मुझसे शादी करना चाहती हे……! तब तो मानो मेरी खुशी का ठिकाना न था….

मैंने उसे तुरंत हाँ कह दिया…. ओर इसी बीच उसकी जॉब एक  marketting कंपनी मे लग चुकी थी…

अब वक्त बहुत हो चला था  और आगे की कहानी उन्होंने अगली मुलाकात मेँ सुनाने का वादा कर के विकुल अपने घर चले गए….!!!!!

मैँ भी आप ही की तरह उनकी बाकी कहानी सुनने के लिए आतुर हूँ,,, कि कैसे उन्होंने अपने घर वालों को मनाया होगा..। कैसे वो अमेरिका मेँ सेट्ल हुए..। और उनकी पत्नी को अपनी जॉब न जाने क्यों छोड़ना पड़ा……

सवाल बहुत हैं,,, पर जबाव किसी का नहीं…. न जाने वो वक्त कब आएगा…… 😊propose-live-on-tv-1024x682

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