“Inspired by dushyant”

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,,  
घर अंधेरा देख,, तू आकाश के तारे न देख,,

एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,,
आज अपनी बाजुओं को देख,, पतवारे न देख,,

अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह,,
वह हकीकत देख,, लेकिन खौफ के मारे न देख,,

अब वे सहारे भी नहीँ,, जंग लड़नी है तुझे,,
आज कट चुके जो हाथ,, उन हाथों में तलवारें न देख

मन को बहला ले इजाजत है मगर,,
आज सपने देख,, लेकिन इस कदर प्यारे न देख…

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रोज रात को जब बारह का गजर होता है,,
यातनाओं के अंधेरे में सफर होता है,,

कोई रहने की जगह है मेरे सपनों के लिए,,
वह घरौंदा सही मिट्टी का भी घर होता है

सिर से सीने में कभी, तो पेट से पाऔं में कभी,,
एक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है

उड़कर पहुंचे कहाँ तक,,
जब हाथ में कोई टूटा हुआ पर होता है

पहले तो सैर के वास्ते सड़कों पर निकलते थे,,
अब तो आकाश से भी पथराव का डर होता है

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यह सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा,,
में सजदे में नहीं था,, आपको धोखा हुआ होगा

यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ,,
मुझे मालूम है,, पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुनकर तो लगता है,,
इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा

यहाँ तो सिर्फ गूँगे ओर बहरे लोग बस्ते हैं
खुदा जाने यहाँ, किस तरह जलसा हुआ होगा

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