“जलन”

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इजाजत ली खुदा से
मोहलत दे फिर मुस्कुराने कि
मिली खुशी बेहोत
अब परवाह नहीं
जमाने की
नाच उठता है
आजकल
खुशी में मेरा मन
पर किसी को आगे बढ़ते देख
क्यों होती है हमें जलन…

तू ओर में,,
दोनों ही बढ़े जा रहे हैं
पीछे मुड़कर देखा
तो कदम भी धुँधला रहे हैं
लौटा है इक ओर हमराही
जो मेरे आगे था चला
पूछा क्या हुआ तुझे
तो बोला
बस यारा अब
में थक सा गया
बहुत किये आगे बढ़ने के पर्यत्न
पर सब करते रहे मुझसे जलन……

अब जरा कदमों कि छाप ढूँढ लूँ
कोई अपना हो यहाँ
तो उसे अपनी आप बीती कहूँ
पर सच कहूँ तो
अब नहीं
कुछ सुनने
सुनाने का मेरा मन
क्योंकि उनके लब्जों में इजाजत
पर दिल टटोलकर देखो
तो है बस जलन……

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