इंतकाल


बीती बातो पर मिट्टी डालो

गड़े मुर्दे तुम न उखाड़ो

बन चुका है जी का जंजाल

कल तक जिंदा थी मेरे अंदर की इंसानियत

पर ,,अब हो चुका है उसका इंतकाल……..
            आज खोदा है गड्डा दिल में

दबाया है इक इरादा उसमें

चेहरा ढ़क देना मिट्टी से

वरना,,
बोल पड़ेगा मेरे अंदर का चंडाल

फिर कहता हूँ न टटोल इंसानियत

क्योंकि हो चुका है उसका इंतकाल….
         इक कहानी सुना गयी हवा कानों में

फिर खिलखिला गयी खुशी तेरी बाँहों में

दम तोड़ न दे मुझसे जुड़ी तेरी ताकत

छोड़ दे अभी,

मोड़ ले अभी,

क्योंकि आ चुका है भूचाल!!!!
         निमिष तो है अंदर से बेहाल

ओर तू है दिल से इक दम कंगाल

प्यार कर किसी अनजान को

क्योंकि…

तेरी यादें नहीं ..

है अब उनका कंकाल

क्योंकि सदियों पहले हो चुका है उनका भी इंतकाल…

# Nimish_Singh_Parihar