कवी और आम इंसान??

यूं तो हम कवी आम इंसान नहीं होते
क्यों बताना जरूरी है क्या??
अरे बोलो- बोलो??

ठीक है -ठीक है
बताता हूं

तो सुन !!!!!

“तेरी शख्सियत को पन्नों में उतारना जानते हैं
और हम तो वही सिरफिरे पागल हैं
जो बस अपने दिल की कहीं बात ही मानते हैं !!

बीहड़ गलियों में इंसानों के चेहरों पर अक्सर दिखता मुस्कराहट तो कभी गम का मुखौटा
अपने रूप को लेकर रहता हरदम परेशान

हाय तोबा मैं कैसा दिख रहा?? बहुत ही दुबला या मोटा

।।आई ना हंसी पर यही सच है।।।

“आगे सुनिये”

हम कवी अपने आप को एक शांतिदूत ओर सन्यासी की तरह मानते हैं
क्योंकि तेरे जज्बातों की कदर है हमें
इसलिए उन्हें कभी कम या ज्यादा नहीं आंकते हैं

रखते हैं अपने पास हरदम शब्दों का एक तराजू
सबको उसी में बराबरी से नापते हैं

“तेरे दिल में है जो चल रहा
किसी बात को लेकर है बैठा सीने में सदियों से
और सोच सोच कर है जल रहा..

बस उसी बात को बड़ी नर्मी से तेरे दिल से निकालते हैं
फिर पन्नों में उतारते हैं
जो बात थी अब तक सबसे छुपी उसे तेरे सामने ही सब में बांटते हैं
तुझे गम से बाहर निकालते हैं

और अब आगे क्या कहें
हम तो सिरफिरे पागल हैं
बस यूं ही लिखते हैं
ओर
अंत में स्वर्ग सिधारते हैं